दारुल उलूम देवबंद का कड़ा फरमान , हॉस्टल में स्मार्टफोन मिला तो तुरंत कार्रवाई ।

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Written by Sudhir Sharma

दारुल उलूम देवबंद का कड़ा फरमान , हॉस्टल में स्मार्टफोन मिला तो तुरंत कार्रवाई ।

नियम तोड़ा तो नामांकन रद्द, छात्रों के लिए कोई ढील नहीं ।

विश्व प्रसिद्ध इस्लामी शिक्षण संस्थान दारुल ‘उलूम देवबंद ‘ एक बार फिर अपने सख्त ,और अनुशासनात्मक फैसले को लेकर चर्चा में है। सहारनपुर स्थित इस ऐतिहासिक मदरसे ने आधुनिक दौर के बीच अपनी पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था को बनाए रखते हुए , छात्रों के लिए नई गाइडलाइन जारी की है। इस बार संस्थान ने हॉस्टल में रहने वाले छात्रों के लिए स्मार्टफोन ,और अन्य मल्टीमीडिया मोबाइल उपकरणों के इस्तेमाल पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी है। यह निर्णय ऐसे समय में सामने आया है जब शिक्षा का बड़ा हिस्सा डिजिटल माध्यमों पर निर्भर होता जा रहा है, लेकिन दारुल उलूम ने साफ संकेत दिया है ,कि वह अपनी मूल शैक्षणिक परंपराओं और अनुशासन से कोई समझौता नहीं करेगा।

संस्थान की ओर से जारी इस आदेश को कैंपस में चस्पा कर दिया गया है, ताकि हर छात्र तक इसकी जानकारी स्पष्ट रूप से पहुंच सके। निर्देश में साफ तौर पर कहा गया है कि कोई भी छात्र चाहे वह नया दाखिला लेने वाला हो या पहले से पढ़ रहा हो अपने पास स्मार्टफोन नहीं रखेगा। यदि किसी भी समय तलाशी के दौरान किसी छात्र के पास स्मार्टफोन या मल्टीमीडिया मोबाइल पाया जाता है, तो उसके खिलाफ तुरंत और सख्त कार्रवाई की जाएगी। इस कार्रवाई में नामांकन रद्द करना भी शामिल है। संस्थान ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि मोबाइल का इस्तेमाल हो रहा हो या नहीं, यदि वह छात्र के पास मिलता है तो उसकी जिम्मेदारी उसी छात्र की मानी जाएगी और किसी भी प्रकार की सफाई स्वीकार नहीं की जाएगी।

दारुल उलूम देवबंद का मानना है कि छात्रों का मूल उद्देश्य तालीम हासिल करना है, लेकिन स्मार्टफोन और डिजिटल उपकरणों का बढ़ता इस्तेमाल उनके ध्यान को पढ़ाई से भटका रहा है। आज के समय में सोशल मीडिया, वीडियो प्लेटफॉर्म और अन्य ऑनलाइन गतिविधियां छात्रों के समय का बड़ा हिस्सा ले रही हैं, जिससे उनकी पढ़ाई पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। संस्थान का दृष्टिकोण है कि जब छात्र हॉस्टल जैसे नियंत्रित माहौल में रहते हैं, तो वहां अनुशासन और एकाग्रता सबसे ज्यादा जरूरी होती है। ऐसे में यदि मोबाइल फोन जैसे साधन उनके पास होंगे, तो उनका ध्यान आसानी से भटक सकता है। यही कारण है कि संस्थान ने इस तरह की सख्त पाबंदी लागू करने का फैसला किया है, ताकि छात्र बिना किसी विचलन के अपनी पढ़ाई पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित कर सकें।

दारुल उलूम देवबंद की शिक्षा प्रणाली पारंपरिक और गहन अध्ययन पर आधारित मानी जाती है, जहां किताबों, उस्तादों और कक्षा शिक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। संस्थान का यह कदम इसी परंपरा को मजबूत करने की दिशा में देखा जा रहा है। प्रबंधन का मानना है कि अगर छात्रों को तकनीकी साधनों से दूर रखकर अध्ययन के वातावरण में पूरी तरह ढाला जाए, तो उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता और अनुशासन दोनों बेहतर हो सकते हैं। यह फैसला इस बात का स्पष्ट संकेत है कि संस्थान अपने छात्रों की शिक्षा और चरित्र निर्माण को लेकर बेहद गंभीर है और इसके लिए वह किसी भी तरह की ढिलाई या जोखिम लेने को तैयार नहीं है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस सख्त फैसले का छात्रों पर क्या प्रभाव पड़ता है और क्या अन्य शिक्षण संस्थान भी इससे कोई सीख लेते हैं या फिर डिजिटल युग के अनुरूप संतुलित रास्ता अपनाते हैं।

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