सोनम वांगचुक क्यों रिहा हुए !

0

हरिकेश कुमार सिंह (एग्ज़िक्यूटिव एडिटर )

केंद्र सरकार ने 14 मार्च 2026 को लद्दाख के प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक पर लगाया गया राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) तत्काल प्रभाव से हटा दिया। इससे उनकी हिरासत खत्म हो गई और वे जोधपुर सेंट्रल जेल से रिहा हो गए, जहां वे सितंबर 2025 से (लगभग 170 दिन) बंद थे।

NSA हटाए जाने के मुख्य कारण (सरकार के आधिकारिक बयान के अनुसार):

  • लद्दाख में शांति, स्थिरता और संवाद को बढ़ावा देना: गृह मंत्रालय (MHA) ने कहा कि सरकार लद्दाख में सभी पक्षों के साथ रचनात्मक और सार्थक संवाद की स्थिति बनाना चाहती है। NSA हटाना इसी उद्देश्य से लिया गया फैसला है।
  • क्षेत्र की आकांक्षाओं और चिंताओं को संबोधित करने के लिए: सरकार लद्दाख के लोगों की मांगों (जैसे राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची में शामिल करना आदि) पर विभिन्न हितधारकों से सक्रिय रूप से बातचीत कर रही है। NSA हटाकर शांति और आपसी विश्वास का माहौल बनाने का प्रयास किया गया।
  • हिरासत की अवधि का लगभग आधा हिस्सा पूरा होना: NSA के तहत हिरासत की अधिकतम अवधि 1 साल तक हो सकती है, लेकिन सोनम ने अब तक आधी अवधि काट ली थी, जिसे सरकार ने ध्यान में रखा।
    पृष्ठभूमि (क्यों लगाया गया था NSA):
    सितंबर 2024-2025 में लद्दाख में लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची में शामिल करने, पर्यावरण संरक्षण और अन्य मांगों को लेकर बड़े आंदोलन चले। सोनम वांगचुक इन आंदोलनों के प्रमुख चेहरा थे और अनशन भी कर चुके थे।
    24 सितंबर 2025 को लेह में हिंसक प्रदर्शन हुए, जिसमें पुलिस फायरिंग में 4 लोगों की मौत हुई और 160+ घायल हुए।
    सरकार ने सोनम पर आरोप लगाया कि उन्होंने हिंसा भड़काई और संवेदनशील बॉर्डर क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की (जैसे नेपाल-बांग्लादेश जैसी Gen Z agitation का जिक्र किया)। इसी आधार पर 26 सितंबर 2025 को NSA लगाकर उन्हें जोधपुर शिफ्ट कर दिया गया था।

अन्य संभावित/अनौपचारिक कारण (समाचारों और विश्लेषण से):

  • सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का दबाव: NSA के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी। रिहाई से ठीक पहले (कुछ दिन पहले) फैसला आया, जिसे कुछ लोग अदालती दबाव से जोड़ रहे हैं।
  • राजनीतिक और सामाजिक दबाव: लद्दाख में लगातार विरोध, देशव्यापी आलोचना और कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग बढ़ रही थी।

सरकारी बयान में मुख्य रूप से शांति और संवाद को आधार बनाया गया है, जबकि आलोचक इसे राजनीतिक मजबूरी या गलत फैसले की सुधार मान रहे हैं।

वास्तविकता ये है की आगामी चुनाव में तीन राज्य ऐसे हैं जहाँ सीमाएँ लगती हैं और असम , बंगाल और ख़ास कर केरल में ये बात अंदरखाने बहुत ज़्यादा फैली हुई थी कि सरकार से कोई माँग या आंदोलन करने पर आंदोलन कारियों के ख़िलाफ़ गृह मंत्रालय या तो NSA लगता है या दमनकारी नीति अपनाता है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *