written by सर्वमंगला मिश्रा (Consulting Editor )

भारत के पूर्वी भाग में स्थित पश्चिम बंगाल का चुनावी इतिहास न केवल राजनीतिक उतार-चढ़ाव से भरा है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन, वैचारिक संघर्ष और जन आंदोलनों की भी कहानी कहता है। यहाँ की राजनीति ने देश की लोकतांत्रिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया है।

स्वतंत्रता के बाद शुरुआती वर्षों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का बंगाल की राजनीति पर वर्चस्व था। 1950 और 60 के दशक में कांग्रेस ने राज्य में कई सरकारें बनाईं, लेकिन धीरे-धीरे जनता में असंतोष बढ़ने लगा। बेरोजगारी, खाद्यान्न संकट और प्रशासनिक कमजोरियों ने विपक्ष को मजबूत होने का अवसर दिया।

1967 में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, जिसे संयुक्त मोर्चा के नाम से जाना गया। हालांकि यह सरकार ज्यादा समय तक टिक नहीं सकी, लेकिन इसने बंगाल की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया। इसके बाद राज्य में राजनीतिक अस्थिरता का दौर चला।

1977 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेतृत्व में वाम मोर्चा सत्ता में आया। यह बंगाल के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय था, क्योंकि वाम मोर्चा ने लगातार 34 वर्षों तक शासन किया—जो भारत में किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का सबसे लंबा कार्यकाल माना जाता है। भूमि सुधार, पंचायत व्यवस्था को मजबूत करना और ग्रामीण विकास इनके प्रमुख एजेंडे थे।

लेकिन समय के साथ बदलाव की मांग फिर उठी। 2011 में तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने वाम मोर्चा को सत्ता से बाहर कर दिया। यह परिवर्तन ‘परिवर्तन’ के नारे के साथ आया और राज्य की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हुई।

इसके बाद से बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस का दबदबा बना हुआ है, हालांकि भारतीय जनता पार्टी ने हाल के वर्षों में अपनी स्थिति मजबूत की है, जिससे चुनावी मुकाबला और भी रोचक हो गया है।

बंगाल का चुनावी इतिहास हमें यह सिखाता है कि यहाँ की जनता जागरूक है और समय-समय पर बदलाव लाने की क्षमता रखती है। यह राज्य भारतीय लोकतंत्र का एक जीवंत उदाहरण है, जहाँ विचारधाराओं की टकराहट के बीच जनता का निर्णय सर्वोपरि रहता है।

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