क्या बंगाल में बढ़ती राजनीतिक हत्याएं लोकतंत्र के लिए खतरा बन चुकी हैं?

written by सर्वमंगला मिश्रा (Consulting Editor)
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पश्चिम बंगाल एक समय अपनी संस्कृति, साहित्य और बौद्धिक चेतना के लिए पहचाना जाता था, लेकिन आज वही बंगाल लगातार राजनीतिक हिंसा और हत्याओं की खबरों से सुर्खियों में है। हर चुनाव के बाद तनाव, संघर्ष और खून-खराबे की घटनाएं आम होती जा रही हैं। हाल ही में भाजपा नेता और पूर्व वायुसेना अधिकारी चंद्रनाथ रथ की हत्या ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, मध्यमग्राम इलाके में बाइक सवार हमलावरों ने चंद्रनाथ रथ पर बेहद सुनियोजित तरीके से हमला किया। भाजपा ने इसे “टारगेटेड पॉलिटिकल किलिंग” बताते हुए सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगाए हैं। वहीं टीएमसी ने भी घटना की निंदा करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
लेकिन सवाल केवल एक हत्या का नहीं है। सवाल उस राजनीतिक माहौल का है, जहां विरोधी विचारधारा रखने वालों की सुरक्षा तक पर प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं। आखिर क्यों बंगाल में हर चुनाव के बाद हिंसा बढ़ जाती है? क्यों राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अब वैचारिक बहस से आगे बढ़कर जानलेवा संघर्ष में बदलती जा रही है?
विपक्ष लंबे समय से ममता बनर्जी सरकार पर “राजनीतिक प्रतिशोध” और “हिंसा की राजनीति” के आरोप लगाता रहा है। सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय स्तर तक आम लोग भी यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या सत्ता बनाए रखने के लिए भय का वातावरण तैयार किया जा रहा है।
चंद्रनाथ रथ केवल किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि एक पूर्व वायुसेना अधिकारी भी थे। उन्हें जानने वाले लोग उन्हें अनुशासित, शांत और राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पित व्यक्ति बताते हैं। उनकी हत्या ने यह चिंता और गहरी कर दी है कि आखिर बंगाल किस दिशा में जा रहा है।
लोकतंत्र में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन हिंसा किसी भी सभ्य समाज का समाधान नहीं हो सकती। यदि राजनीतिक विरोध का जवाब गोलियों से दिया जाएगा, तो लोकतंत्र की मूल भावना कमजोर होगी। बंगाल को फिर से अपनी सांस्कृतिक पहचान और लोकतांत्रिक परंपराओं की ओर लौटना होगा।
राजनीति जनता की सेवा का माध्यम होनी चाहिए, भय और रक्तपात का नहीं।
