ईरान एंबेसी की प्रदर्शनी में गूंजा मासूमों का दर्द !

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Written by सैयद समीना उवैस

ईरान एंबेसी की प्रदर्शनी में गूंजा मासूमों का दर्द,

तस्वीरों ने सुनाई 147 बच्चों की अधूरी कहानी

जहां रंगों में सपने होने थे,

वहां अब दर्द की कहानी लिखी है ।

नई दिल्ली ,

जिस आँगन में कभी बच्चों की हँसी गूंजती थी, आज वहीं सन्नाटा पसरा है। मिट्टी वही है, दीवारें वही हैं, दरवाज़ा भी वही है… लेकिन अब उस घर में ज़िंदगी नहीं, बस यादें रह गई हैं। पहले जहां हर सुबह छोटे-छोटे कदमों की आहट सुनाई देती थी, आज वहां सिर्फ खामोशी है। खिलौने वैसे ही पड़े हैं, लेकिन उन्हें उठाने वाला कोई नहीं। दीवारों पर बनी रंग-बिरंगी लकीरें अब भी गवाही देती हैं कि यहां कभी बचपन खेला करता था। मगर अब हर कोना जैसे रो रहा है। ऐसा लगता है जैसे उस घर की हवा भी भारी हो गई है, जैसे हर सांस में दर्द घुल गया हो। जो आँगन कभी खुशियों से भरा रहता था, आज वहीं बैठकर लोग चुपचाप आंसू बहाते हैं।

एक मां के दिल का दर्द शायद इस दुनिया का सबसे बड़ा दर्द होता है। जब वह अपने बच्चे को सुबह स्कूल के लिए तैयार करती है, तो उसके चेहरे पर मुस्कान होती है और दिल में ढेर सारी उम्मीदें। वह उसके बाल ठीक करती है, उसके बैग में खाना रखती है और प्यार से कहती है – जल्दी आना। फिर दिन भर उसी इंतजार में बिताती है। हर थोड़ी देर में दरवाज़े की तरफ देखती है, जैसे अभी उसका बच्चा दौड़ता हुआ अंदर आएगा और कहेगा – मां, आज स्कूल में क्या हुआ। लेकिन जब वही मां शाम तक इंतजार करती रह जाए और अचानक उसे खबर मिले कि उसका बच्चा अब कभी वापस नहीं आएगा… तो उस पर क्या बीतती होगी? उस पल उसकी दुनिया ही खत्म हो जाती है। उसकी सांसें चलती रहती हैं, लेकिन जीने की वजह खत्म हो जाती है। वह रोती है, चिल्लाती है, लेकिन उसका बच्चा उसे सुनने के लिए अब इस दुनिया में नहीं होता।

इसी तरह की एक दिल दहला देने वाली घटना की चर्चा सामने आई, जिसमें बताया गया कि एक स्कूल पर हमला हुआ और उसमें सैकड़ों मासूम बच्चों की जान चली गई। करीब 147 बच्चे… सोचिए, 147 घरों के चिराग एक साथ बुझ गए। वो बच्चे, जिनके हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, जो अपने सपनों को रंग दे रहे थे, जो अपनी छोटी-छोटी खुशियों में दुनिया ढूंढ लेते थे… वो अचानक इस दुनिया से चले गए। किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि स्कूल जाने वाला वो दिन उनकी ज़िंदगी का आखिरी दिन होगा। किसी मां ने ये नहीं सोचा होगा कि जिस बच्चे को वह प्यार से विदा कर रही है, उसे फिर कभी गले नहीं लगा पाएगी। ये सिर्फ एक खबर नहीं है, ये एक ऐसा जख्म है जो कभी नहीं भरेगा।
इस दर्द को और करीब से महसूस करने के लिए एक प्रदर्शनी लगाई गई, जहां उन बच्चों की तस्वीरें और उनकी बनाई हुई आखिरी पेंटिंग्स रखी गई थीं। कोई बच्चा सूरज बना रहा था, जैसे उसकी दुनिया हमेशा रोशनी से भरी रहेगी। कोई अपने परिवार के साथ खुशहाल घर बना रहा था। कोई रंगों से अपनी छोटी-छोटी खुशियां कागज़ पर उतार रहा था। लेकिन इन तस्वीरों को देखकर लोगों की आंखें नम हो गईं। हर पेंटिंग जैसे एक सवाल बनकर सामने खड़ी थी – हमने क्या गलती की थी? वहां मौजूद लोग बस खामोश थे। कोई जवाब नहीं था। सिर्फ आंसू थे, और दिल में एक भारी सा दर्द। ये प्रदर्शनी सिर्फ तस्वीरों की नहीं थी, ये उन अधूरे सपनों की कहानी थी, जो कभी पूरे ही नहीं हो पाए।

इस पूरी कहानी का मतलब बहुत सीधा है – इंसानियत सबसे ऊपर होनी चाहिए। जंग कभी भी सिर्फ सीमाओं पर नहीं लड़ी जाती, उसका असर सबसे ज्यादा मासूमों पर पड़ता है। जब बच्चे मारे जाते हैं, तो सिर्फ एक परिवार नहीं टूटता, पूरी दुनिया हार जाती है। कोई भी जीत इतनी बड़ी नहीं हो सकती कि उसके सामने बच्चों की जान छोटी लगे। हमें रुककर सोचना होगा कि हम किस दिशा में जा रहे हैं। अगर हमारे फैसलों की कीमत मासूम जिंदगियां हैं, तो ऐसी जीत का क्या मतलब? आखिर में रह जाता है तो सिर्फ दर्द, पछतावा और वो खालीपन… जिसे कभी भरा नहीं जा सकता। यही सच है, और यही सबसे बड़ी चेतावनी भी।

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