Harish Rana Life Story: हरीश राणा की वो ज़िंदगी , जो कभी जी ही नहीं गई !
Harish Rana Life Story: अगर वो एक हादसा नहीं हुआ होता तो आज हरीश राणा की जिंदगी शायद कुछ और ही कहानी सुना रही होती। एक हादसा और पूरी जिंदगी की दिशा बदल गई वरना आज हरीश राणा की दुनिया कुछ और होती।
Written By Rishika Mishra (Digital coordinator)

Harish Rana Life Story: क्या हर एक पल… आने वाले ठीक अगले ही पल से अलग हो जाता है? ये सवाल आपको थोड़ा अजीब लगेगा, आप सोचेंगे की हम ऐसा क्यों कह रहे हैं….लेकिन जब आप आगे की कहानी पढ़ेंगे तो आप भी मेरी तरह ही कहेंगे शायद हाँ। शायद आज हरीश राणा एक नॉमल जिंदगी जी रहे होते। शायद उनके माता पिता को इस तरह हॉस्पिटल के गलियारों में सालों नहीं बिताना पड़ता। शायद ये कहानी कभी लिखी ही नहीं जाती, लेकिन एक हादसे ने सब कुछ बदल दिया। कभी-कभी जिंदगी खत्म नहीं होती, लेकिन जीने का मौका खत्म हो जाता है हरीश राणा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक ऐसा युवा जिसकी जिंदगी एक हादसे के बाद 13 साल तक हॉस्पिटल बेड और मेडिकल इक्विपमेंट (Medical Equipment) के बीच सिमट कर रह गई। लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे पढ़कर आप भी सोच में पड़ जाएंगे । एक ऐसी जिंदगी जो शायद वो भी जी सकते थे, अगर ये हादसा नहीं हुआ होता।
एक पल… और उसके बाद 13 साल
कहा जाता है जिंदगी बदलने में समय लगता है, लेकिन कभी-कभी जिंदगी बदलने में सिर्फ कुछ सेकंड लगते हैं। चार मंज़िल की ऊँचाई से गिरने के बाद हरीश राणा की जिंदगी अचानक एक ऐसी खामोशी में बदल गई, जहां आवाज़ें तो थीं, लेकिन मशीनों की, डॉक्टरों की (doctor), और मॉनिटरों की(monitors) ,नहीं थी तो सिर्फ हरीश की अपनी कोई आवाज़।
उस दिन के बाद से क्या हुआ ?
कैलेंडर आगे बढ़ता रहा, दुनिया लगातार बदलती रही,लेकिन उनकी जिंदगी वहीं रुक गई.
हरीश राणा की वो जिंदगी जो कभी शुरू ही नहीं हो पाई…
हर इंसान की जिंदगी में कुछ एक्सपेक्टेड चैप्टर होते हैं। जैसे पढ़ाई खत्म करना, पहली जॉब हासिल करना, अपनी पहचान बनाना, अपने माता-पिता का सहारा बनना। हरीश की 13 साल पहले की जिंदगी ने भी यही चैप्टर लिखे थे, लेकिन पूरे होने से पहले ही पन्ने पलट गए , ईबारत बदल गई और बदल गईं वो लकीरें जो हाथों में थी । इनकी कहानी में एक लंबा pause आ गया, एक ऐसा pause, जो कभी खत्म नहीं हुआ।
करियर का 13 साल —एक लंबा समय होता है…
लोग स्टूडेंट से professionals बन जाते हैं, single से married हो जाते हैं . parents बन जाते हैं, लेकिन हरीश राणा (Harish Rana) के लिए 13 साल का मतलब था. एक बेड, एक रुम और वही मेडिकल ये टाइम तो था, लेकिन कोई प्रोग्रेस नहीं थी.
सबसे बड़ा नुकसान जो दिखता नहीं
जब हम ऐसे केसेस के बारे में पढ़ते हैं, तो हम कहते हैं थैंक गॉड की “जिंदगी बच गई।” लेकिन इस कहानी में एक और लॉस, जो दिखाई नहीं देता। वो जिंदगी जो जी ही नहीं गई, वो कैरियर जो शुरू नहीं हुआ, वो फैमली जो बनी नहीं इसके साथ ही वो पहचान जो बन नहीं पाई। ये वो लॉस हैं जो measurable नहीं है, लेकिन सबसे गहरा होता है.
झकझोर कर रख देती है मां-बाप के मन में ये सवाल
मां-बाप के मन में एक सवाल जो कभी खत्म नहीं होता हर दिन, हर साल… शायद एक ही सवाल लौटकर आता होगा, अगर वो हादसा नहीं हुआ होता तो आज हमारा बच्चा कहाँ होता? हालांकि आज इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है । ऐसे केस में बस संभावनाएं होती हैं, और वही संभावनाएं सबसे ज्यादा दर्द देती हैं। ऐसे में एक ना मानने वाला सच भी है । मेडिसिन जिंदगी को थामे रख सकती है, लेकिन हर बार उसे पहले जैसा वापस नहीं ला सकती।” हरिश के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ मशीन ने शरीर को तो संभाला, लेकिन जिंदगी को वापस नहीं ला सकीं। ये कहानी यहीं खत्म नहीं होती…
और आखिर में...
ये हर किसी के दिल पर एक छाप छोड़ जाती है कुछ कहानियाँ जीवन के साथ खत्म हो जाती हैं। लेकिन कुछ कहानियां सवाल बनकर रह जाती हैं। हरिश की कहानी भी वैसी ही है। ये हमें मजबूर करती है सोचने के लिए.. क्या सिर्फ जिंदा रहना ही जिंदगी है, क्या होश और समझ (awareness) के बिना जीवन पूरा माना जा सकता है, क्या गरिमा (dignity) भी जिंदगी का उतना ही अहम हिस्सा है जितना सांस लेना? इन सवालों के साथ हरीश की ये कहानी खत्म नहीं होती, बल्कि हमारे और आपके मन में ऐसे ही कई और सवाल छोड़ जाते हैं।
